ख्वाब आते रहो ..जाते रहो

•जुलाई 21, 2008 • Leave a Comment

ख्वाबों के शहर को ढूँढने निकला हूँ .ख्वाब इतने हसीं कैसे होते हैं .रात में आ जाए तो फिर दिन में भी आंखों में बसे रहते है .कभी कभी ये आंखों में चुभ भी जाते है . लेकिन ये न हों तो जिंदगी में इतने रंग भी न हों .इसलिए ख्वाबों को में चाहता हूँ . ख्वाब आते रहो ..जाते रहो !!

 
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